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Showing posts from March, 2018

न जाने क्यूँ मेहरबां हुआ है

न जाने क्यूँ  मेहरबां  हुआ है हमारे  दिल में  ख़ुदा  बसा है कोई नफ़स पर सवार होकर हमारे  भीतर   उतर  रहा  है जिसे समझना है जो, समझ ले हक़ीक़त  अपनी  हमें  पता है हमारे  घर  की हर ए...

जब हम धीरे धीरे मरने लगते हैं

जब  हम  धीरे  धीरे  मरने  लगते हैं दीवारों पर अक्स  उभरने  लगते  हैं शक्ल तसव्वुर में  होती  है जो रंगीन उसके  सारे   रंग   उतरने   लगते  है कोशिश  करते  हैं जीवन  मे रंग भ...

जिंन्दगी को शाद करने के लिए

जिंन्दगी  को  शाद करने के लिए जी  रहे  हैं  लोग  मरने  के  लिए आइने   की  साफ़गोई   देख  कर वो  हुए  राज़ी   सँवरने   के  लिए ख़ुदसरी  अपनी  ही  ज़िम्मेदार है अपने  ही  साये  से ...