पर्वत हमारी पीर का आख़िर पिघल गया

पर्वत  हमारी  पीर  का  आख़िर  पिघल  गया
आँखों से आज झरनों की सूरत  निकल गया

कूए-ख़याल1   से   तेरे   गुजरे   हैं   बार   बार
ख़्वाबों  को  जब  हमारा तसव्वुर2  बदल  गया

जब  शादमानियों3 से  राफ़ाक़त4  हुई  शुरू'अ
बैरी  नसीब  फिर  से  कोई  चाल  चल  गया

सोज़े5 - मुहब्बत  आपकी   इतनी   शदीद6  थी
दिल तो बहल गया था मगर जिस्म7 गल गया

कामिल8 तो माहे-इश्क़ को होना ही था, हुआ
सूरज अना का  सामने  उसके  जो  ढल गया

ऐसी  है  शै हसद9 कि हुई  जब  भी  ये नसीब
उट्ठा  नहीं  धुआँ  मगर   इंसान   जल गया

अहमक़  अमूमन  आदमी   होता  नहीं  कोई
लेकिन ख़याले-ख़ाम10 में ख़ुद को ही छल गया

जुगनू  को हक़ है  ख़ुद को नुमायाँ  किया करे
बस  ये  बयान  ही  मेरा  सूरज  को खल गया

ज़ेहनी-तवाज़ुन11 आज था मुंसिफ़ का कुछ ख़राब
हक़  में  किसी के  फैसला होना  था,  टल  गया

पूनम   बहन   मुआफ़   करो   मैं   न   आ  सका
चाहा  नहीं   किसी  ने   मगर  वक़्त   टल   गया

कितना   है   बदनसीब   'तिवारी'   कि   हाथ  से
मौका   जो   हिंदवी  ने   दिया  था, फिसल  गया

शेषधर तिवारी
23 09 2019

1विचारों की गलियाँ  2कल्पना  3खुशियों  4दोस्ती
5 मुहब्बत की तपिश  6तीब्र  7शरीर   8पूर्ण   9ईर्ष्या
10असंगत विचार   11मानसिक संतुलन

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