हड्डियों पर मांस है खिसकी रज़ाई की तरह

हड्डियों पर मांस है खिसकी रज़ाई की तरह
हो गया है  जिस्म  झिलँगी  चारपाई की तरह

जिन मसूढ़ों पर कभी अखरोट-तोड़ू दाँत थे
अब  उन्हें  ही चूसता है वो खटाई की तरह

जब  कभी  मिलती हैं  मीठे दूध में भीगी हुयी
रोटियाँ लगती हैं उसको रस मलाई की तरह

लहलहाती फस्ल  की उम्मीद  में  टकला हुआ
बाल फिर निकले वही, पिछड़ी बुवाई की तरह

याद  आती  है  उसे अपनी जवानी बार बार
देखता है ख़्वाब में ख़ुद को कन्हाई की तरह

पोटली की आस में मिलती तवज्जोह देखकर
फेर  लेता  है  वो  मुँह  रूठी  लुगाई  की  तरह

झुर्रियाँ  चेहरे  पे  कुछ  ऐसे  उकेरीं  वक़्त  ने
दो  नये  बैलों  से  की  पहली जुताई की तरह

खूबसूरत इस ग़ज़ल को नाम चाहे जो भी दें
ये  नुमाया  है  वरक़  पर  रोशनाई  की तरह

शायरी  भी  हो  गई  पेटेन्ट  अंडरवर्ल्ड  की
लोग  धमकाने  लगे  कुख्यात  भाई की तरह

Comments

Popular posts from this blog

शबे वस्ल ऐसे उसको खल रही थी

पर्वत हमारी पीर का आख़िर पिघल गया

मेरा ख़ुशियों से साबका पूछा