किसी को नहीं गवारा, रहे मो'तबर से हटना
किसी को नहीं गवारा, रहे मो'तबर से हटना
मगर अब जो थक गए हैं , उन्हें है सफ़र से हटना
उसी झील के किनारे, हैं रुकी हमारी आँखे
उन्हें था नहीं गवारा, तेरे जिस्मे तर से हटना
जो ख़ुशी पड़ी हो पीछे,किसी ग़म को क्यों मैं पालूँ
कहीं और मार ले मुँह, तू मेरी नज़र से हट ना
कोई और मेरे दिल में, न करेगा अब बसेरा
तुझे हो यक़ीन इसपर, तभी दिल के दर से हटना
तेरी याद के हैं पैकर, मेरी आँख के ये आँसू
इन्हें है नहीं गवारा, मेरी चश्मे तर से हटना
लो मुरीद आइना भी, तेरे रूप का हुआ यूँ
तेरे अक्स पर सितम है, तेरी ही नज़र से हटना
कहीं थक के रुक न जायें, मेरे पाँव रास्ते में
नहीं ख़ारों को गवारा, मेरी रहगुज़र से हटना
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