बस एक ख़ता की जो, सौ बार सज़ा दोगे
बस एक ख़ता की जो, सौ बार सज़ा दोगे
इस तरह तो तुम मेरी, हस्ती ही मिटा दोगे
हालात से घबरा कर, जब मौत भी माँगूँगा
फित्रत है तुम्हारी ये, जीने की दुआ दोगे
ख़्वाहिश है तुम्हे अपना, हमराज़ बनाने की
डरता हूँ मुझे अपनी, नज़रों से गिरा दोगे
ताबीर की ख़्वाहिश में, कुछ ख़्वाब जो देखेंगी
आँखों की ख़ता की तुम, नींदों को सज़ा दोगे
तुमको हो मसर्रत तो, माँगू में क़ज़ा ख़ुद ही
पर तुम भी करो वादा, मरने की दुआ दोगे
जन्नत भी मेरी ख़ातिर, उतरेगी ज़मीं पर ही
सीने से लगाने की, जिस वक़्त रज़ा दोगे
हैं वज्ह मेरे आँसू, दरिया में रवानी की
तुमसे जो बताऊँगा, तो हँस के उड़ा दोगे
मर्ज़ी से तुम्हारी ही, हर साँस चलेगी अब
तुम मुझसे करो वादा, माँगूँ तो क़ज़ा दोगे
मालूम नहीं तुमको, शादां हूँ अभी तक मैं
अब जान लिया है तो, क्या ज़ख़्म नया दोगे
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