सितमईजाद! तेरे साथ भी इक पारसा हूँ मैं

सितमईजाद! तेरे  साथ  भी  इक  पारसा  हूँ मैं
लगे हैं सर पे जो पत्थर बस उनको गिन रहा हूँ मैं

मुझे दौरे ख़िजां का ज़र्द  पत्ता मत  समझ लेना
गुबार आलूद हूँ, हालात से लड़कर थका हूँ मैं

कभी  राहे  अदब  में  जो  रहे थे  मील के पत्थर
उन्हें खुद अपनी वक़अत पर फ़सुर्दा देखता हूँ मैं

मुझे जब भी गिराती है मुख़ालिफ़ वक़्त की आंधी
उठाकर  जिस्म  अपना गर्द उस की झाड़ता हूँ मैं

सुकून आयेगा मुझको जब मुआफ़ी ख़ुद से माँगूँगा
हर  इक के वास्ते  खुद पर सितम ढाता रहा हूँ मैं

जहाँ रिज़्क़े सताइश भी नहीं मिलता अदीबों को
उसी महफ़िल में देखो आज क़िस्मतआज़्मा हूँ मैं

कभी कोताहफ़हमी तो कभी बाइस हसद था, पर
गलत  हर  बह्स  में  बेवजह  ठहराया  गया  हूँ  मैं

मेरे   शानाबशाना   ग़ैरमुतअस्सिर   खड़े   होंगे
तभी   मालूम   होगा   इब्तिदाए   इंतिहा  हूँ   मैं

मेंरे सर पर ही ज़िम्मेदारियों का बोझ लाज़िम है
बड़ा  बेटा  जो  इक  बीमार  बूढ़े  बाप  का  हूँ मैं

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