खुद को हम दे के थपकी सुलाते रहे
खुद को हम दे के थपकी सुलाते रहे
बारहा ख़्वाब आ कर जगाते रहे
क़ब्र पर साथ अदू के वो आते रहे
दफ़्न करके भी मुझको जलाते रहे
इक ग़ज़ल जो कही थी तेरी शान में
उम्र भर हम उसे गुनगुनाते रहे
आँखें सहरा हुईं अश्क जैसे सराब
आ के पलकों पे बस झिलमिलाते रहे
बादे मर्ग आयेंगे याद उनको बहुत
उम्र भर जो हमें याद आते रहे
ख़्वाहिशे जिस्म हावी रही इस तरह
रूह से हम निगाहें चुराते रहे
बात किसकी करें भूल जायें किसे
ओढ़ कर ख़ामुशी दूर जाते रहे
आज मंज़िल पे हैं सिर्फ़ वो ही जो ख़ुद
रास्ता अपनी ख़ातिर बनाते रहे
मुझको उम्मीद उनके पिघलने की थी
वो मेरे सब्र को आज़माते रहे
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