ज़िन्दगी कैसे कटे ऐ ज़िन्दगी तेरे बग़ैर
ज़िन्दगी कैसे कटे ऐ ज़िन्दगी तेरे बग़ैर
दिल्लगी करने लगी है हर ख़ुशी तेरे बग़ैर
कोशिशें मैंने बहुत कीं दम पे सूरज के मगर
हो नहीं पाती है घर में रौशनी तेरे बग़ैर
तेरा चेहरा देखकर ही फूल खिलते थे जहाँ
उस चमन में है फ़सुर्दा हर कली तेरे बग़ैर
मेरे घर में टूटकर बिखरे हैं आईने कई
और हर टुकड़े में है सूरत तेरी तेरे बग़ैर
जिसको सोचा भी नही, मंज़र वही है सामने
धूप सी लगने लगी है चाँदनी तेरे बग़ैर
बारहा अब इक सवाल आने लगा है ज़ेहन में
क्या ज़रूरत है हमें अनफ़ास की तेरे बग़ैर
हँस रहा हूँ आज अपनी बेबसी को सोच कर
ये भी एक तर्ज़े खुशी दिल को मिली तेरे बग़ैर
दिन पहाड़ों से लगे रातें सुरंगों की तरह
ज़िंदगी की राह है मुश्किल भरी तेरे बग़ैर
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