हथेली पर तेरी, अपना मुक़द्दर ढूंढता हूँ

हथेली पर तेरी, अपना मुक़द्दर ढूंढता हूँ
समंदर हूँ, मैं टकराने को पत्थर ढूंढता हूँ

मेरी उन ख़्वाहिशों में, फ़त्हे ज़िन्दानी1 निहाँ है
मैं जिनके वास्ते ज़द2 पर सिकंदर ढूंढता हूँ

मेरा दिल इस क़दर ज़ख़्मों का आदी हो गया है
कि रोज़ इसके लिये कोई सितमगर ढूढ़ता हूँ

कहाँ से आ रहे हैं अश्क जो रुकते नहीं हैं
मैं अपने में निहाँ कोई समुन्दर ढूंढता हूँ

नहीं डूबा हूँ कैसे ग़म के दरिया में अभी तक
मैं अपने सब्र का पैकर3 शनावर4 ढूंढता हूँ

विदा अपनी हुई बेटी तभी से हाल ये है
कि हर बेटी के पैरों में महावर ढूंढता हूँ

यक़ीं करना है तो कर, या न कर, ये तेरी मर्ज़ी
मैं हर इक शै में तुझको ही बराबर ढूंढता हूँ

ग़लतफ़हमी में खुशियों को जहाँ मैं छोड़ आया
वो तिफ़्ली दौर यादों के वरक़ पर ढूँढता हूँ
उसी बचपन को यादों के वरक़ पर ढूँढता हूँ

कहीं आदत न बन जाये बहारों का ये मौसम
तमाज़त में निकल कर बादे सरसर ढूँढता हूँ
निकल कर धूप की गर्मी में सरसर ढूंढता हूँ

1 गुलामी पर विजय 2 निशाना 3 मूर्तरूप 4 तैराक 5 बचपन 6 धूप की गर्मी

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