दर्द को आँसू बनाकर देखते है

दर्द  को  आँसू   बनाकर  देखते है
बाद  इसके  मुस्करा कर देखते हैं

सूरतें जिनकी तसव्वुर में हों उनको
लोग  क्यूँ  नज़रें  बचाकर  देखते हैं

दूर  हो जाते हैं हम अपनी ख़ुदी से
फिर तेरे नज़दीक आ कर देखते हैं

नाउमीदी  के  समुंदर  तक न जाए
प्यास को समझा-बुझाकर देखते हैं

दौरे-हाज़िर  है  रवां दरिया के जैसे
वक़्त के उस पार  जा कर देखते हैं

खोज लेगा वो हमें, दावा है उसका
ख़ुद को उसमें ही छुपाकर देखते हैं

रौशनी  के  वास्ते  ज़हनों  पे  तारी
तीरगी  को  ही  जलाकर  देखते हैं

शादमानी  के  समुंदर  से  मिले  जो
ग़म का वो दरिया  बहाकर देखते हैं

जिस्म  में  घुटने  लगा है दम हमारा
ख़ुद को बाहर  ही बिठाकर देखते है

27th August 2017

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