वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है
वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है
एक शीतल जल सरीखी, दूसरी सूखी नदी है
बीत जाती है यही सच जानने में उम्र सारी
बोझ साँसों का ख़ुशी से ज़िन्दगी ये ढो रही है
फल मिले या मत मिले मैं कर्म अपना कर रहा हूँ
बात गीता में कहा श्री कृष्ण ने भी तो यही है
मर गयीं संवेदनायें, बेअसर हैं आज आँसू
पीर दिल की आज दिल में ही सिमट कर रह गयी है
तेज खोकर सूर्य जब होने लगे जल में बिखण्डित
तब समझ लेना अँधेरी रात की आहट हुई है
नींद पर निर्भर नहीं है स्वप्न का साकार होना
जागते में जो उपक्रम से मिला फल तो वही है
कर रहे थे आज तक हम प्रार्थना अपने लिए बस
इसलिए असफल रहे, इच्छा अधूरी ही रही है
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