नौए इंसां को तू कुछ सच की समाअत दे ख़ुदा
नौए इंसां को तू कुछ सच की समाअत दे ख़ुदा
आदमी में कुछ तो इंसानी शराफ़त दे ख़ुदा
ढो रहे हैं जो तसव्वुर में ख़ुद अपनी लाश को
ज़हन में उनके तू बच्चों की मलाहत दे ख़ुदा
बेअमां बीमार बेआराम हैं जो दहर में
तू उन्हें वज्हे मसर्रत की इनायत दे ख़ुदा
ज़िंदगी में दूसरों के वास्ते हो ख़ुद नज़ीर
हर जवां को वुसअतों की क़ाबिलियत दे ख़ुदा
जो मेरी उज्रत के दम पर साहिब ए आलम बने
तू उन्हें मेरे लिए फ़िक्रे अयादत दे ख़ुदा
जो रहा करते हैं नाहक़ माइले पैकर उन्हें
करके बा रस्ता रवा मानूस चाहत दे ख़ुदा
तू नबर्दा है न पूछूँगा सबब ताख़ीर की
बस फसीले शब गिरा देने की कुव्वत दे ख़ुदा
जिंदगी के मरहलों ने दी अज़ीयत आज तक
हाज़ते जश्ने तरब को अब नसीहत दे ख़ुदा
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