रुठ जाने से तेरे बेशक बिखर सकता हूँ मैं

रुठ जाने से तेरे बेशक बिखर सकता हूँ मैं
इस हक़ीक़त से मगर इक दिन मुकर सकता हूँ मैं

क्या हुआ हासिल तुझे ए दिल बिगाड़ा क्यों मुझे
बाज आ हरक़त से तो अब भी सुधर सकता हूँ मैं

देखना मत साक़िया चश्मे हिकारत से मुझे
छोड़ कर मय, तिश्नगी के साथ मर सकता हूँ मैं

रूह मेरी कब्र में तो क़ैद हो सकती नहीं
उस जहां में भी तुझी से प्यार कर सकता हूँ मैं

मेरी ख़ुद्दारी इजाज़त तो नहीं देती मगर
तेरी ख़ातिर अपनी हद से भी गुज़र सकता हूँ मैं

हो गयी है आज कल रंजूर मेरी ज़िन्दगी
तू मिले तो हर खुशी की माँग भर सकता हूँ मैं

आस्तीं में साँप पाले हैं कई मैंने मियाँ
आप जैसे बिच्छुओं से कैसे डर सकता हूँ मैं

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