अल सहर मुर्गे ने जब फिर बाँग दी

अल सहर मुर्गे ने जब फिर बाँग दी
सुब्ह ने फिर  शब को सूनी माँग दी

वक़्त  ने  रख़्ते-सफर  के  नाम  पर
ज़िन्दगी को ख्वाहिशों की भाँग दी

पाँवों  में  ताकत  जिगर में जोश है
किस  लिए  ये  ऊर्जा   सर्वांग   दी

खून उसका क्यूँ किया तूने सफेद
देह तो, अच्छा किया,  गौरांग दी

थक गया जब ढोते ढोते, आख़िरश
आज  उसने  लाश  अपनी  टाँग दी

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