यही  है  वज्ह  सारी  मुश्किलों  की


यही  है  वज्ह  सारी  मुश्किलों  की
कि हमने बात सबके हक़ की क्यों की

करें हम बात क्यूँ ख़ारों  गुलों की
अभी बाक़ी हैं जब बातें रूतों को

ख़िजां ने कर दिया जिनको बरहना
शजर वो क्यूँ करें फ़िक्र आँधियों की

जलावतनी* सताएगी किसी दिन
उन्हें याद आएगी अपनी जड़ों की

नज़र आतीं नहीं जब तक मनाज़िल
तभी  तक  अहमियत  है  रास्तों की

मरूँगा  जिनको  सीने  से  लगाकर
मुझे  है  फ़िक्र  तेरे  उन  ख़तों  की

मुनासिब सोच का पहलू तो निकले
तभी  तो  बात  हो कुछ जावियों की

जिसे  मैयत  पे  रोना  चाहिए  था
उसीने आख़िरी कील आज ठोंकी

हमीं   हैं   चाँद   सूरज   के   सहारे
करें  कब  फ़िक्र  जुगनू ज़ुल्मतों की

ढकेला  दहर  में  तुमने  ही हमको
ज़रूरत   है   हमें  भी  रहमतों  की

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