रवानी पा के साहिल को सफ़ीना छोड़ देता है
रवानी पा के साहिल को सफ़ीना छोड़ देता है
न हो इंसान ज़िंदादिल तो जीना छोड़ देता है
फँसे गिर्दाब में अह्ले-शनावर जो तो उसका भी
तनावर जिस्म पानी में पसीना छोड़ देता है
हर इक इंसां करे पूरा सफर मुमकिन नहीं होता
कोई काशी कोई कोई मदीना छोड़ देता है
ख़ुशी या ग़म के बाइस फिर पहुँच जाता है मैखाने
वही जो खा के कसमें, रोज़ पीना छोड़ देता हैं
उतर जाता है ज़हरे-ज़िन्दगी रग रग से इंसां के
मगर अपना असर वो भीना भीना छोड़ देता है
लिए फिरता है ख़्वाहिश मन में जब भगवान बनने की
फिर इंसां अपना इंसानी करीना छोड़ देता है
ज़माना ज़ख़्म पर जब ज़ख़्म देता जाता है पैहम
तो इंसां थक के अपने ज़ख़्म सीना छोड़ देता है
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