नाख़ुदा ही जब सफीना ले चला गिर्दाब में
नाख़ुदा ही जब सफीना ले चला गिर्दाब में
अब करे तकिया तो किस पर ज़िन्दगी सेराब में
यूँ बुरा लहज़ा तेरा इतनी करख़्त आवाज़ है
जैसे बातें आ रही हों डूबकर तेज़ाब में
शम्स! अपने को छुपाकर देखना तो था कभी
रौशनी बाक़ी बची रहती है क्या महताब में
ग़म सभी अपने छुपाकर मुस्कराते जाइये
ताप की शिद्दत निहाँ होती नहीं सीमाब में
ज़िन्दगी से जब शिकायत है हर आमो ख़ास को
ढालते हैं अपनी शख़्सीयत को क्यूँ नव्वाब में
मैं सहारे फिर उसी दीवार के बैठा हुआ
ख़ुश हूँ बाहों में लिए तुझको, भले ही ख़्वाब में
क्या ज़रूरत है करे इंसां कोई रिश्ता ख़राब
जब कि खुशियाँ हैं मयस्सर बंदगी आदाब में
बुज़दिलों के मशवरों से 'शेष' हिम्मत भी गयी
क्यूँ सहारा माँगना तिनकों से इक सैलाब में
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