इंसान ख़ुद अपने में ही उलझा तो नहीं है
इंसान ख़ुद अपने में ही उलझा तो नहीं है
या अपने गुनाहों से ही सहमा तो नहीं है
ख़ुद उसकी ख़ुदी थी जो बनी हार का बाइस
चेहरे पे इसी बात का गुस्सा तो नहीं है
है मुनअकिस आँखों में तेरी प्यास का दरिया
इन में ही समुंदर कहीं ठहरा तो नहीं है
दुश्मन है परेशान यही सोच के शायद
जो साथ है उसके मेरा साया तो नहीं है
रहती है रक़ाबत भी रफ़ाक़त में निहाँ क्यूँ
दोनों में कहीं प्यार का रिश्ता तो नहीं है
मुझको जो मयस्सर है तबाही के बदल कुछ
उसमें भी कहीं आपका हिस्सा तो नहीं है
करती है तमाज़त में कमीं देख के बादल
ख़्वाहिश में कहीं धूप के छाया तो नहीं है
फित्रत है तो परवाज़ की कोशिश तो करेगा
पिंजरे का परिंदा मगर उड़ता तो नहीं है
*हैं आप ग़ज़लगो तो ख़याल इसका है लाजिम*
*मफ़हूम _सुख़नवर_ से उठाया तो नहीं है*
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