कोई सूरत बदलता है कोई सीरत बदलता है
कोई सूरत बदलता है कोई सीरत बदलता है
कोई हर रोज़ अपनी जात और नीयत बदलता है
मुखौटा नोचकर देखो तो चेहरा सामने आये
न जाने कैसे इंसां अपनी कैफ़ीयत बदलता है
ख़बर तुमको नहीं भायी तो आख़िर क्या करे क़ासिद
कभी इसके लिये क्या वो किसी का ख़त बदलता है
लहू से जाते जाते जायेगी फ़ित्रत गुलामी की
ये आदमज़ाद सदियों में कोई आदत बदलता है
असीराने कफ़स दिन क़ैद के तू काट ले हँस कर
ख़ुदा रोने से कब इंसान की किस्मत बदलता है
हमारी आपसी नाइत्तिफ़ाक़ी पर सियासतदां
हर इक अम्नो अमां की राह की सूरत बदलता है
चलो मिलकर नयी तंज़ीम अपनी हम बनाते हैं
मुसीबत में ही अक्सर आदमी फ़ित्रत बदलता है
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