इक गुनह जो हुआ नही होता

इक गुनह जो हुआ नही होता
ये  जहां  ही  बसा  नही  होता

नाम उसका ही रख दिया सूरज
जिसके घर में दिया नहीं होता

मैं अजाबों से होके गुजरा हूँ
कैसे कह दूँ ख़ुदा नहीं होता

देखने का सही नजरिया रख
चाँद  छोटा  बड़ा  नहीं होता

नाउम्मीदी के पाँव में बेशक
एक भी आबला नहीं होता

दर्द का कुछ इलाज़ कर मौला
अब ये बढ़ कर दवा नहीं होता

इश्क़ अंजाम तक पहुचता तो
कोई आशिक फ़ना नही होता

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