नहीं आसां है इक इंसान का यूँ भी ख़ुदा होना

नहीं आसां है इक इंसान का यूँ भी ख़ुदा होना
भला इस बात पर बन्दे, ख़ुदी से क्या ख़फ़ा होना

जहन्नुम जायें बादे मर्ग या जन्नत में जायें हम
सलामत ज़िन्दगी जब तक है तब तक क्यों फ़ना होना

हुकूमत तुम करो या मैं करूँ या वो करे लेकिन
रिआया और हाकिम में है लाज़िम रब्त का होना

मुक़द्दर तू भी अपना आज़मा ले कौन रोकेगा
तेरी किस्मत में भी बेशक़ है किस्मत आज़मा होना

न होता वो अगर मुश्किलकुशा तो कैसे होता ये
चढ़े दरिया में पत्थर का यकायक जेरे पा होना

खिलाये जब हसीं ज़ज़्बात हमने दिल के गुलशन में
तभी मुमकिन हुआ दिल का हमारे दिलकुशा होना

भले बेआबरू होकर निकलते थे मियाँ ग़ालिब
उन्हें तस्कीन देता था तेरे दर का खुला होना

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