आइने को तोड़कर चेहरा किसे अच्छा मिला
आइने को तोड़कर चेहरा किसे अच्छा मिला
जब मिला अपना ही चेहरा टूटकर बिखरा मिला
तैरती लाशों को जब देखा तो आया ये ख़याल
ज़िंदगी भर जिस्म को बस बोझ साँसों का मिला
आँसुओं से बेवफ़ाई की तवक़्क़ो थी मुझे
शुक्र है जज़्बा मेरी आँखों को सागर सा मिला
टूटते तारे से मैंने आज फिर माँगा तुझे
आज फिर उसने दग़ा की, फिर तुझी से जा मिला
बादलों ने नक्श दिखलाये कई मुझको मगर
हार कर वो रो पड़े कोई नहीं तुझसा मिला
शम्स को ठेंगा दिखाकर रौशनी अपनी लिये
तीरगी में भी हर इक जुगनू हमें उड़ता मिला
आबरू अपनी बचा या डूब मर ऐ दुश्मनी
हाल पर मेरे, मेरा दुश्मन मुझे रोता मिला
पढ़ रहे थे एक दिन हम अपने माज़ी की किताब
सिर्फ़ बचपन का वरक़ रंगीन पहले सा मिला
बस यही बदलाव दिखता है हजारों साल में
दौर पत्थर का गया, इंसान पत्थर का मिला
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