दरमियां सिर्फ़ इक मुद्द'आ रह गया

दरमियां सिर्फ़ इक मुद्द'आ रह गया
खो के तुमको मैं कैसे बचा रह गया

तू शिकायत कोई मुझसे करता नहीं
इक इसी बात का बस गिला रह गया

यूँ तो मेरे मुक़द्दर में तू था नहीं
फिर भी उम्मीद का सिलसिला रह गया

आँसुओं ने किया नम यूँ सहारा को भी
मेरा नक्शे कफ़े पा बना रह गया

मिल गया वो अनासिर में होकर फ़ना
और मैं बस उसे देखता रह गया

जाल को साथ लेकर परिंदे उड़े
और सय्याद का मुँह खुला रह गया

सुब्ह दम फिर से सूरज उगा सुर्ख़रू
शब की ख़्वाहिश का फिर मस'अला रह गया

कुछ तो मज़बूर तुम थे रहे हम भी कुछ
दरमियां जो बना फासला रह गया

Comments

Popular posts from this blog

शबे वस्ल ऐसे उसको खल रही थी

पर्वत हमारी पीर का आख़िर पिघल गया

मेरा ख़ुशियों से साबका पूछा