यहाँ चर्चा बहुत है रौशनी का
यहाँ चर्चा बहुत है रौशनी का
मगर चेहरा नहीं दिखता किसी का
सराबों पर यकीन आने लगा है
मिले शायद वहीं हल तश्नगी का
रहे जिसमे बरस जाने की कुव्वत
बसे घर साथ उसके दामिनी का
दिये की लौ ज़रा हिलती रहे बस
भरम कायम रहेगा रोशनी का
उठाकर आँख भी देखा न उसने
सबब पूछा जो मैंने बेदिली का
हुआ है एकतरफा इश्क कैसे
समुन्दर से है क्या रिश्ता नदी का
किसी के वास्ते क्यों जान दें हम
नहीं है शौक हमको ख़ुदकुशी का
मुझे मंज़िल की अब पर्वा नहीं है
मैं क़ाइल हूँ तुम्हारी रहबरी का
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