जिन्हें अहबाब की हक़ बात भी अच्छी नहीं लगती

जिन्हें अहबाब की हक़ बात भी अच्छी नहीं लगती
उन्हें ताउम्र अपनी ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती

दिखा मत ज़ोर अपना अब्र तू नाशाद सूरज को
किसी भी दिलजले को दिल्लगी अच्छी नहीं लगती

खिला रहता नहीं क्यूँ चाँद यकसाँ जैसे पूनम का
हसीं चेहरों पे  फीकी सी हँसी अच्छी नहीं लगती

जिसे जो रास आये, रास्ता कर ले इबादत का
अक़ीदत पर कभी छीटाकशी अच्छी नहीं लगती

ख़ुदा ने दी हमें रूहे मुक़द्दस जिस्म से ढक कर
सबब कोई भी हो बेपर्दगी अच्छी नहीं लगती

हुये जब अब्र अफ़सुर्दा तो सूरज भी हुआ मद्धिम
हो दुश्मन ग़मज़दा तो दुश्मनी अच्छी नहीं लगती

हिसारे जिस्म से आज़ाद हो ऐ रूहे पाकीज़ा
पुराने पैरहन में इक परी अच्छी नहीं लगती

गरीबों से न करिये ज़िक्र अपनी शादमानी का
जब आँखें सुर्ख़ हों तो रौशनी अच्छी नहीं लगती

भले  ही है वो नाबीना पर उनको ढूँढ़ लेता है
जिन्हें बेनूर आँखों में नमी अच्छी नहीं लगती

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