मौत ऐसे मेरे पीछे पड़ गयी है
मौत ऐसे मेरे पीछे पड़ गयी है
जैसे उसकी जान मुझमे ही बसी है
चाहता है वो हमारी मौत कब से
याद ही जिसकी हमारी ज़िंदगी है
क्यूँ हँसी बेजा लगी तुमको हमारी
शादमानी जब हमें तुमने ही दी है
मर ही जायेगी तड़प कर एक दिन ये
भूख की क़िस्मत में ही फ़ाक़ाकशी है
दरमियां जब भी हुई अश्कों की बारिश
रब्त की राहों में फिसलन बढ़ गयी है
दफ़अतन मुझसे ही रस्ता पूछ बैठा
रौशनी जिसने मेरी आँखों की ली है
हारने के बाद भी जीतोगे तुम ही
क्यूँ कि मेरी जीत में भी हार ही है
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