हर वरक़ का शबाब हो जाऊँ
हर वरक़ का शबाब हो जाऊँ
इक मुकम्मल किताब हो जाऊँ
मैं बज़ाहिर ख़राब हो जाऊँ
आब से मैं शराब हो जाऊँ
शिद्दते तिश्नगी से मैं पिघलूँ
और फिर आब आब हो जाऊँ
बीच ख़ारों के जब रिहाइश है
क्यूँ नहीं मैं गुलाब हो जाऊँ
चाँद मुझसे भी रौशनी मांगे
मैं भी इक आफ़ताब हो जाऊँ
तेरी फ़ित्रत है ख़्वाब में आना
मैं हक़ीक़त से ख़्वाब हो जाऊँ
रूह जब है तुझी में वाबस्ता
मैं भी तेरा हिजाब हो जाऊँ
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