लौट आया हूँ मैं यह जिस्म कुँवारा लेकर

लौट आया हूँ मैं यह जिस्म कुँवारा लेकर
रूह  लौटेगी  तेरी  रूह  से  वादा लेकर

ख़ुश्क पाया तो किया पार मगर डरते हुए
रेत से दरिया निकल आये न धारा लेकर

आ रही थी वो लहर ले के लबों सी लाग्जिश
हँस दिए  हम  भी निगाहों  में किनारा लेकर

मेरी उम्मीद को मुश्किल हुई दरपेश कोई
आ न जाये कहीं फ़ेहरिश्ते ख़सारा लेकर

नींद आई ही नहीं मुझको कई रातों से
सो रहा हूँ मैं तभी नाम तुम्हारा लेकर

हमने  किरदार  निभाए  हैं  कई दुनिया में
ले के शमशीर, कभी दर्द का चारा लेकर

चाँद शाखों में उलझ कर ही न रह जाये कहीं
डालियाँ झूम उठीं साथ हवा का लेकर

वक़्त हरगिज़ ही मुनासिब न रहा मेरे कभी
फिर भी जाता मैं कहाँ रोज ये दुखड़ा लेकर

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