किनारों से मिलकर जो दरिया चला है

किनारों से मिलकर जो दरिया चला है
समंदर  की  बाहों  में  वो  ही  गया   है

जिसे    देखकर   ख़ल्क़   हैरतज़दा  है
वो   इंसान  अपने  ख़ुदा   से   ख़फ़ा  है

मुहब्बत  में  अक्सर  ये  देखा  गया  है
कि   जो   हारता   है   वही  जीतता  है

मैं  रहता  हूँ  आईनादारों  की  ज़द पर
पता  है  उन्हें,  ये  भी  इक  आइना  है

चराग़ों   से    वो   रौशनी   छीन   लेंगे
गुमां   ये   अँधेरों   को   होता   रहा  है

मेरे  हाल  पर  किस  क़दर है वो बेकल
मुझे  चुप  करा  कर  जो ख़ुद रो रहा है

दिया    जिस्म    इंसान   को   खूबसूरत
ख़ुद   अपने   लिये   तूने  पत्थर चुना है

पुरअसरार  नज़रों  से  मत देख मुझको
तेरे  दिल  की  हसरत  मुझे  भी  पता है

मुलाकात    होगी    कभी    ज़िंदगी   से
तो   पूछूँगा   "कोई  सितम  रह  गया  है"

बढ़ाते   नहीं    हैं    मेरा   हौसला   क्यूँ
मेरे   दोस्तों   को   ये   क्या  हो  गया है

मुनासिब  नहीं  था हर  इक  को बताना
बहुत   सोचकर   मैंने   तुमसे   कहा  है

बढ़ी   है   हवा   में नमी   कुछ   ज़ियादा
किसी  को  कोई  आज  याद आ रहा है

किसी   के   लिए   जान   दे दूँ  मैं  अपनी
नहीं   मुझको   मंज़ूर   ये   फ़लसफ़ा   है

कतर   कर   हमारे   निकलते   परों  को
वो   हमको   बताते   है   परवाज़  क्या  है

तू   रोये   तो   रोऊँ,   हँसे   तो   हँसूँ   मैं
कोई    कर्ज़   मुझपर   तेरे   बाप   का   है ?

अभी   मौत   का   दिन  मुक़र्रर न करना
अभी    मुझको    पूरी   तरह   टूटना   है

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