मौत आयेगी यही उम्मीद लेकर जी रहा हूँ
मौत आयेगी यही उम्मीद लेकर जी रहा हूँ
ज़िंदगी के ज़हर को अमृत समझकर पी रहा हूँ
ज़िंदगी की मुश्किलों से हारना सीखा नहीं है
डूब जाने तक शिकस्ता नाव का माझी रहा हूँ
चाक होती जा रही है आपसी रिश्तों की चादर
मैं कभी रो कर कभी हँस कर उसे फिर सी रहा हूँ
वुसअते अख़लाक़ पर क़ायम रहा क़ायम रहूँगा
मैं सदा रौशन चिराग़ों के लिये बाती रहा हूँ
तज़रुबा ये भी ज़रूरी था, गिरा हूँ फर्श पर जो
अर्श तक मैं माइले परवाज़ इक पंछी रहा हूँ
ऐ सितारों चाँद का यूँ ही हमेशा साथ देना
वक़्त था, हर हाल मैं अहबाब का संगी रहा हूँ
दौरे हाज़िर में "भगत" होना जरूरी हो गया है
एक अरसे तक अना को मार कर गांधी रहा हूँ
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