रुत है हसीं ये कहकर, जिसको बुला रहा है

रुत है हसीं ये कहकर, जिसको बुला रहा है
दौरे खिजां का परचम, वो ले के चल चुका है

आये तो थे सुनाने, हम दास्तान अपनी
लेकिन वो दास्तां खुद, अपनी सुना रहा है

उस पर यक़ीन मुझको, होने लगा है फिर से
जब से सुना है कसमें, मेरी वो खा रहा है

अशजार उस चमन के, किस पर यक़ीन कर लें
खुद बागबां ही जिसका, गुलचीं बना हुआ है

सूरज जिधर से निकला, उस ओर ही चलेंगे
सूरज का भी तो सूरज, मग़रिब में डूबता है

देते हैं हम तसल्ली, इक दूसरे को लेकिन
जाना है हर किसी को, सब को ये सच पता है

जब ज़िंदगी हमारी, नीलाम पर चढ़ेगी
बोली लगायेगा वो, जो ख़ुद बिका हुआ है

यूँ तो हज़ार राहें, जाती हैं तेरी जानिब
मैंने जिसे चुना है, वो राह कुछ ज़ुदा है

सूरज की रोशनी है, जब चाँदनी का बाइस
क्यूँ छोड़कर उसे फिर, ये चाँद पर फिदा है

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