यही फ़लसफ़ा मेरी ज़िन्दगी मुझे बार बार बता गई


यही फ़लसफ़ा मेरी ज़िन्दगी मुझे बार बार बता गई
जिसे याद करके हँसा किया वही पास आके रुला गई

मेरी डूब जाने की चाह पर हुई क्यूँ ख़िलाफ़ लहर कि जो
मुझे बार बार उछाल कर वो किनारे फिर से लगा गयी

तुझे ढूढते रहे उम्र भर कभी रूबरू तू नज़र तो आ
तुझे मान लेंगे ख़ुदा अगर मेरी रूह तुझमे समा गई

उसी नाशनास की फ़िक्र में मेरा दिल बहुत ही उदास है
मेरे ख़्वाब में बनी झील में कोई गुलबदन जो नहा गई

मैं रक़ीब हूँ न रफ़ीक़ हूँ नज़र एक बार मिली है बस
मैं कुसूरवार तो हूँ नहीं मुझे फिर भी दे के सज़ा गई

है बहुत अजीब जहान ये कभी हक़ बयानी करे भी क्यूँ
मेरा दिल तड़पता है और धड़कना इसे ही दुनिया बता गई

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