मेरे ख़ालिक़ तू ही बता मुझको

मेरे  ख़ालिक़  तू ही बता  मुझको
ज़ीस्त लगती है क्यूँ सज़ा मुझको

चाँद  सा  दाग़दार  हूँ  मैं  भी
यूँ नहीं लगती बद्दुआ मुझको

फिर नयी टीस का मज़ा चाहूँ
ज़ख़्म फिर दे कोई नया मुझको

रूह  तो  तेरे  पास  जा  बैठी
जिस्म कोसे है बारहा मुझको

आ गया तू  गिरिफ़्त  में सूरज
चाँद के दाग़ अब दिखा मुझको

आया  रोते  हुए  मैं  दुनिया में
कैसे हँसते हैं ये सिखा मुझको

जिंदगी दी तो मौत की खातिर
तू ने रब और क्या दिया मुझको

कोई  सुनता  नहीं  सदा  मेरी
कर दे आवाज़े नौ अता मुझको

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