मिला करता हूँ अपने आप से भी बेरुख़ी से
मिला करता हूँ अपने आप से भी बेरुख़ी से
बहुत मायूस हो बैठा हूँ शायद ज़िंदगी से
अँधेरा ओढ़कर सूरज को झुठलाता मैं कब तक
निकल आया हूँ अब मैं जामे जम1 की तीरगी से
ख़याल अच्छा रहा होगा कभी, बहलाने को दिल
नहीं रिश्ता कोई सहरा का अब भी तिश्नगी से
ख़ुदा आये न शख़्सीयत में कोई ऐब मेरी
कि होगी सोच मुत'अस्सिर ख़ुद अपनी ही कमी से
अदब में क्यूँ तवज्जोह दें सियासत को भला हम
क़लम के हम सिपाही हैं तो लड़ते हैं इसी से
हमारी ख़ामुशी की चीख सुन लेता है मौला
जो मिलता है सदाए हक़2, सदाक़त3 की हिसी4 से
समंदर पर भरोसा क्यूँ नहीं होता क़मर को
जो तौज़ीन5 उसकी करता है न जाने किस सदी से
1 जिसे पीने पर काल्पनिक चीजें दिखाई पड़ती हैं
2 सच्ची पुकार
3 सच्चाई
4 सम्बेदना
5 तौल
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