अगर तुम राह में दो चार भी काँटे बिछा देते

अगर तुम राह में दो चार भी काँटे बिछा देते
हमारे  पाँव  के  छाले  तुम्हे कितनी दुआ देते

ख़ुदाया! तुम जो सहरा1 में कोई दरिया बहा देते
मुसाफ़िर  को  सराबों2  के  फरेबों  से  बचा  देते

कहेंगे  शायरेनौ3  भी  जमालीयात4  पर ग़ज़लें
पता होता तो ग़ालिब अपनी सब ग़ज़लें जला देते

करें क्या हम, परेशां है वलद5 तजहीज़6 की ख़ातिर
ख़ुदाया काश सब सामान हम पहले जुटा देते

हमारे दिल में जो हलचल मची है ज़लज़ला अफगन
ठहर जाती तो हम दिल को धड़कने की सज़ा देते

हमें किरदार अभी तो इंतिहा तक का निभाना है
नहीं  तो  हम  बहुत  पहले  ही  ये  पर्दा गिरा देते

सबक़ लेता नहीं कोई किसी की ज़िंदगानी से
अगर ये झूठ होता तो तुम्हे हम सच बता देते

सियाही  मज़हबी  भरते  हैं  दावाते-अदब  में  जो
वही शायर ख़ुद अपना खून काश इसमें मिला देते

1 मरुस्थल
2 मृग मरीचिका
3 नये दौर के शायर
4 सौंदर्य संबंधी बातें
5 पुत्र
6 अंतिम क्रिया के लिये सामान जुटाना
7 कवि, शायर

Comments

Popular posts from this blog

शबे वस्ल ऐसे उसको खल रही थी

पर्वत हमारी पीर का आख़िर पिघल गया

मेरा ख़ुशियों से साबका पूछा