बाइस उदासियों का भी मुझको कहा नहीं
बाइस उदासियों का भी मुझको कहा नहीं
कैसे ये मान लूँ कि है मुझसे ख़फ़ा नहीं
जिससे न थी उमीद, चला आया लौटकर
मायूस हूँ कि शिकवा गिला क्यूँ किया नहीं
ऐजाज़ है तेरा ही जो चारा बग़ैर भी
होकर मरीज़े-दिल में अभी तक मरा नहीं
इस तरह ज़िन्दगी ने सताया था शख़्स को
वक़्ते-नफ़सशुमारी भी बिल्कुल डरा नहीं
काफ़ूर है सुकून जो चेहरे से आप के
उसका सबब हैं आप कोई दूसरा नहीं
मुतअस्सिर आख़िरश हुआ रूदाद से मेरे
लेकिन यक़ीन आज भी उसको हुआ नहीं
आते हैं जो मसर्रतों के ख़्वाब रात भर
उनका है राज़ क्या ये अभी तक खुला नहीं
आया तो था मनाने मगर हो गया ख़फ़ा
ये रंग दोस्ती का अभी तक गया नहीं
अपने ही जब लगे हैं मुझे ग़ैर की तरह
जीने का फिर तो कोई भी बाइस बचा नहीं
इकराम इस जहां में उसी का हुआ किया
जिसने ख़ुद अपने आप को रुस्वा किया नहीं
क्यूँ ज़िन्दगी किसी की भी जिन्दां में हो ख़ुदा
जीते जी क़ब्र में तो कोई भी गया नहीं
मंज़िल की मुश्किलात से जो हार मान ले
उसको तो रास्ता भी कोई सूझता नहीं
मंदिर में जा के देखिए पत्थर बना ख़ुदा
इंसान हो के हमसे कभी ये हुआ नही
बाइस कारण
ऐजाज़ चमत्कार
नफ़सशुमारी साँसें गिनना
मुतअस्सिर प्रभावित
आख़िरश अन्ततः
रूदाद कहानी
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