क्यों मन:स्थिति हो रही है अव्यवस्थित आजकल
क्यों मन:स्थिति हो रही है अव्यवस्थित आजकल
क्यों हृदय रहने लगा मन से सशंकित आजकल
सूर्य पर वातावरण का पड़ रहा है दुष्प्रभाव
हो रहा है सत्य मिथ्या से कलंकित आजकल
ज्ञान का आरंभ है पर अंत होता ही नहीं
किंतु हैं इस तथ्य से ज्ञानी अपरिचित आजकल
झूठ हो दुष्कर्म हो या पाप हो कुविचार हो
सब दिखाई पड़ रहे हैं वित्त-पोषित आजकल
चाहिए मकरंद तो मधुकर तनिक रहना सजग
पुष्प भी पातें नहीं पोषण परिष्कृत आजकल
धर्म का इस सृष्टि में चिर काल से अस्तित्व है
हो गया संदर्भ भी इसका विवादित आजकल
फल हमें देते रहे जो धूप में जलकर स्वयम्
हैं पुराने वृक्ष उपवन में तिरस्कृत आजकल
सूर्य से निकली धवल, वातावरण दूषित मिला
है नहीं कोई किरण खल-दृष्टि-वंचित आजकल
Comments
Post a Comment