तुम्हारी याद में रोना मुझे अच्छा लगे क्यूँ
तुम्हारी याद में रोना मुझे अच्छा लगे क्यूँ
तुम्हे खोना ज़ियादा की तवक्को सा लगे क्यूँ
यक़ीं मुझको तो है मैं पार कर जाऊँगा दरिया
तू ही जाने तुझे मेरा घड़ा कच्चा लगे क्यूँ
सहा जाता नहीं था तल्ख़ लहज़ा भी किसीका
मगर हर दर्द अब दिल को मेरे मीठा लगे क्यूँ
तेरी सीरत से होते हैं अयाँ किरदार कितने
मगर सूरत से तू अब भी मुझे बच्चा लगे क्यूँ
तक़ीया* है मगर वाज़िब सवाल आता है मन में
हर इक सिक्का मुझे अपना ही अब खोटा लगे क्यूँ
खुशी में साथ होती है रफीक़ों की ज़माअत
मगर वक़्ते मुसीबत तू मुझे तनहा लगे क्यूँ
तेरी आँखों से जब आँसू छलकते देखता हूँ
समंदर से निकलता सा कोई दरिया लगे क्यूँ
*वह बात जो सच हो पर भय वश कहने का मन न करे
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