नक़ाब आईने से अब तो हटा दे
नक़ाब आईने से अब तो हटा दे
तू ख़ुद को अपनी अस्लीयत बता दे
मरज़ तू है तो वजहे मौत बन जा
दवा है तो असर कुछ तो दिखा दे
तुझे बेग़ैरती रास आ गयी है
भले इक रोज़ वो तुझको रुला दे
पता है जब तेरी बेइख़्तियारी
कोई ऐसे में कैसे मश्वरा दे
हटा दे बोझ तू सीने से अपने
हमारे राज़ दुनिया को बता दे
यक़ीं कैसे नहीं करता मैं तुझपर
बज़ाहिर नेक थे तेरे इरादे
हक़ीक़त है वही जो सामने है
फ़साने चाहे तू जितने सुना दे
ख़ताएँ कर ले तू तस्लीम अपनी
तो शायद ज़िन्दगी फिर मुस्करा दे
बहुत उकता गया हूँ मैं ख़ुशी से
ख़फ़ा होने का कोई मुद्दआ दे
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