ज़ख्म का अब नहीं गिला कोई

ज़ख्म का अब नहीं गिला कोई
ऐसे  मरहम  लगा  गया  कोई

दोस्ती की न चाह हो जिसमें
ऐसा दुश्मन नहीं मिला कोई

ज़िंदगी मेरी इस तरह गुजरी
क़र्ज़ जैसे उतर गया कोई

टीस देती है इसको हर धड़कन
ज़ख्म रहता है जब हरा कोई

आँसुओं का कहाँ बसर मुमकिन
ख्वाब आँखों में भर गया कोई

ख्वाब टूटा तो फिर तुझे माँगा
मेरी आँखों में है खला कोई

आँसुओं को तो रोक लेता हूँ
फूट जाता है आबला कोई

रात सपने में खून से मेरे
मांग भर कर सँवर गया कोई

देखकर अक्से रूह चेहरे पर
तोड़ देता है आइना कोई

नब्ज़ जिसके पयाम से खुश है
दिल सा होगा न दूसरा कोई

रात भर जाग कर गिनूँ तारे
अब कहाँ ऐसा सिलसिला कोई

Comments

Popular posts from this blog

शबे वस्ल ऐसे उसको खल रही थी

पर्वत हमारी पीर का आख़िर पिघल गया

मेरा ख़ुशियों से साबका पूछा