कमी अहबाब की खलने लगी क्या

कमी अहबाब की खलने लगी क्या
तुम्हारी आस्तीं तुम पर हँसी क्या

खिचे आते हैं तेरी बज़्म मे सब
चिराग़ों के तले है रौशनी क्या

कहा है वक़्त से ये झुर्रियों ने
हमें तू कर सकेगा मुल्तवी क्या

सुना है आजकल मायूस हो तुम
हमारी फ़िक्र फिर होने लगी क्या

वफ़ा की क्यों करूँ उम्मीद तुमसे
समुंदर से निकलती है नदी क्या

सुना है आप भी रहने लगे खुश
शराफ़त आपने भी छोड़ दी क्या

हवायें ख़ुश्क हैं सहरा में हर सू
सराबों पर रक़म है "तिश्नगी" क्या

खुली क्यूँ रह गयीं आँखें तुम्हारी
अभी रक़्साँ है इनमें ज़िंदगी क्या

हुये  हैं   आबदीदा   शाहे  आलम
हुयी गुस्ताख़ कोई किरकिरी क्या

नये  फतवे  मुसलसल आ रहे हैं
कि राहे अम्न पर है आदमी क्या

यकायक  छलछला  आई  हैं आँखें
चिरागे ज़ेह्न की लौ बुझ गयी क्या

तेरा क्या मौत! आ जाना कभी फिर
मिलेगी   ज़िंदगी    ये   दूसरी   क्या

समुंदर   की   तलहटी   में   पड़ा   है
महे कामिल ने कर ली खुदकुशी क्या

ख़ुदा! दर  पर  तेरे  आया  है काफ़िर
जली  रस्सी  की  ऐंठन भी गयी क्या

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