कभी अख़लाक़ से उनको तुम अपने घर बुला लेना
कभी अख़लाक़ से उनको तुम अपने घर बुला लेना
बहुत आसान होता है फ़क़ीरों से दुआ लेना
उसी को रौशनी देता है मह जो वज्ह है ख़म की
है मुश्किल बदमुआमलगी में यूँ रिश्ते निभा लेना
चलो ज़ेरे ज़मीं अब कुछ नहीं रख्खा है दुनिया में
कोई जाकर हसीनाओं की क़ब्रों का पता लेना
तुम्हे अपनी जफ़ाओं का अगर अहसास हो जाये
तो आकर मुझसे तुम नज़रें मिलाना फिर झुका लेना
क़सम है दुश्मनी की चैन से मरने दे ऐ दुश्मन
हमारी क़ब्र पर आकर भले तू मुस्करा लेना
न होती धूप तो सहरा में होता हमनशीं फिर कौन
सुकूं देता है उसको अपने साये में बिठा लेना
जब आहन को भी पिघलती हैं मुर्दा खाल की आहें
सता कर मुफलिसों को बेसबब क्यूँ बद्दुआ लेना
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