निभा कर फ़र्ज़ अब सुस्ता रहा हूँ
निभा कर फ़र्ज़ अब सुस्ता रहा हूँ
ख़ुदा ! तेरे इशारे को रुका हूँ
वही पीछे पड़े हैं ले के पत्थर
मैं जिनकी फ़िक्र में पागल हुआ हूँ
मेरे सीने पे रख कर पाँव बढ़ जा
तेरी मंज़िल नहीं मैं रास्ता हूँ
मुझे अपनों ने क्यूँ ठुकरा दिया है
ये गैरों से लिपट कर पूछता हूँ
किसी को भी बना सकता हूँ पानी
बज़ाहिर यूँ तो पत्थर दिख रहा हूँ
सबब दरिया है या उसकी रवानी
जो पत्थर हो के भी मैं बह चला हूँ
सहम कर चल रही है नब्ज़ मेरी
उसे लगता है मैं उससे खफ़ा हूँ
धड़कना बंद कर दे ऐ मेरे दिल
सुकूं तुझको मिले, मैं भी थका हूँ
सबब पूछो न मेरी ख़ामुशी का
मैं अपनी चीख सुनकर डर गया हूँ
शेषधर तिवारी
इलाहाबाद
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