अयाँ ग़म में भी जो मसर्रत नहीं है
अयाँ ग़म में भी जो मसर्रत नहीं है
तो ये ज़िन्दगी की अलामत नहीं है
झुके हो मुहब्बत में तुम आसमां सा
तो ये कोई वज्हे-मज़म्मत नहीं है
यही ज़िन्दगी है तो तुझको मुबारक
हमें रोज़ मरने की आदत नहीं है
रुलाकर ख़ुदा आज़माता है हमको
ये है फ़िक्र उसकी शरारत नहीं है
मुझे छोड़ दें मुश्किलों में अकेला
मेरे दोस्तों की ये फ़ित्रत नहीं है
मुखौटा उदासी का आँखों में आँसू
मगर इनमें दिल की हक़ीक़त नहीं है
खिजाँ साथ रुत के बहारों तक आयी
सबा की कोई इसमें हिकमत नहीं है
सदा ग़मगुसरों ने मेरी सुनी तब
मसर्रत की जब मुझको हाजत नहीं है
अनायास पीछे पड़ी है तू सब के
तेरी मौत दुनिया में इज्जत नहीं है
जो मेरा था, मुझको दिया ज़िन्दगी ने
मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है
करो ग़ौर हर एक पहलू पे तब ही
बढ़ाओ क़दम, कोई आफ़त नहीं है
अगर आज टूटा है तो कल जुड़ेगा
कि तर्के-तअल्लुक कयामत नहीं है
बहुत ख़ुश हूँ, मैं रास्ता हूँ तुम्हारा
बनूँ मंज़िल इसकी जरूरत नहीं है
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