ज़िन्दगी तूने ही दी थी, ले के मेरा क्या लिया
ज़िन्दगी तूने ही दी थी, ले के मेरा क्या लिया
ख़ुदकुशी का मुझसे नाहक़ फ़ैसला करवा लिया
बौखलाए इस क़दर उसकी तमाज़त से कि ख़ुद
अपने साये में ही हमने धूप को बैठा लिया
रेत को पानी बताने की ख़ता सहरा ने की
तो सराबों ने हमारी प्यास से बदला लिया
वक़्ते रुख़्सत तुझसे फिर सुनने की ख्वाहिश थी मगर
मन ही मन वो गीत तेरा मैंने ख़ुद ही गा लिया
वो फ़िदा ऐसे हुए इक रोज़ अपने हुस्न पर
ख़ुद को आईने में देखा और फिर बोसा लिया
माहे कामिल है जो घर में उसको देखा भी नहीं
दिल अधूरे चौदवीं के चाँद से बहला लिया
जब ख़ुदा करने लगा तक़सीम अपनी नेमतें
धूप ने अपनी सुकूनत के लिए साया लिया
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