ख़ाक के ज़र्रात अपने रायगाँ होंगे नहीं
ख़ाक के ज़र्रात अपने रायगाँ होंगे नहीं
कुछ ब दोशे आसमां होंगे तो कुछ ज़ेरे ज़मीं
पाँव रखने की जगह मुझको मयस्सर है नहीं
बाद मरने के मगर मिल जाएगी दो गज़ ज़मीं
गोशबर1 आवाज बैठे हैं तुम्हारे सेह्न में
अक्स है ज़ेहनी तवाज़ुन का यही ताज़ातरीं
1आहट पर कान लगाये हुये
कौन ज़िम्मेदार है ताराजिए गुलज़ार# का
फ़र्ते पैमाने वफ़ा* या कमनिगाही** पर यक़ीं
#सुकून की बर्बादी
*अत्यधिक वफ़ा की अपेक्षा
**उपेक्षा
दिल से उसकी धड़कने ये पूछती हैं पै ब पै @
क्यों तने तनहा2 तुझे अब कर गया तेरा मकीं
@लगातार
2 नितांत अकेला
मूपरीशां3 हाल में है आज सारी बदलियाँ
बिजलियाँ ढा दें अगर तो कुछ तअज्जुब है नहीं
3 बाल बिखेरे हुये
ज़िंदगी आसान हो जाती हमारी ख़ुद ब ख़ुद
ग़ौर से जो देख लेते हम ख़ुद अपनी आस्तीं
Comments
Post a Comment