बात कुछ तो है तबीअत आज घबराई बहुत
बात कुछ तो है तबीअत आज घबराई बहुत
क्यों तुम्हारी याद मुझको नाशनास आई बहुत
क्या पता था मुश्किलें होंगी फज़ा में इस क़दर
जुर्अते-परवाज़ पर अपने तू पछताई बहुत
स्याह ज़ुल्फ़ें, मस्त आँखें, सुर्ख़ आरिज, महज़बीं
उस पे सूरत तिफ़्ल सी भोली, मुझे भाई बहुत
क्यूँ तसव्वुर में दिखाई तुम पड़े हो अश्कबार
क्यूँ तुम्हारी ज़ुल्फ़ बरहम हो के लहराई बहुत
मैं तुम्हे ढूँढूँ कहाँ मुझको तुम्हारी फ़िक्र है
जानता हूँ, लब खुले तो होगी रुसवाई बहुत
राबिता तुमसे नहीं होना है फिर, ये इल्म है
सोचता हूँ फिर भी तुमको, हूँ मैं सौदाई बहुत
मुख़्तसर से इस सफर में तुम न होते साथ अगर
रास्ता कटता मगर ले ले के जमुहाई बहुत
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