हुस्न की हमसे ख़ुशामद अब नहीं होती

हुस्न की हमसे ख़ुशामद अब नहीं होती
जज़्बएकामिल की आमद अब नही होती

दूर  रहकर  भी  कभी  वो  पास थी मेरे
ज़ेहन में रहकर बरामद अब नहीं होती

जो निशाने पर रहा करती थी ख़ुद पैहम
वो  हमारे  तीर  की  ज़द  अब नहीं होती

दायरे   हमने   बनाये   थे   कभी  अपने
सोच की लेकिन कोई हद अब नहीं होती

ख़्वाहिशें मेरी उतर जाती थीं मीज़ां से
एक भी ख़्वाहिश मेरी रद अब नहीं होती

मैं  तसव्वुर  था  तेरा  तू  कल्पना  मेरी
दरमियां आवाज़ अनहद अब नहीं होती

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