तू अगर बेहौसला होता नहीं
तू अगर बेहौसला होता नहीं
देख कर हमदर्द को रोता नहीं
फ़िक्रक होती है नए दिन की उसे
चैन से सूरज कभी सोता नहीं
साथ सदियों से समंदर है मगर
साहिलों में ज़िंदगी बोता नहीं
दूरियाँ कितनी भी तै कर ले मगर
रास्ता मंज़िल कभी होता नहीं
चाहता है देखना बेदाग़ उसे
यूँ ही दरिया चाँद को धोता नहीं
हम अगर मुंसिफ़ की नीयत जानते
तो मुख़ालिफ़ फैसला होता नहीं
माँ के आँचल की मिले जब छाँव तो
तिफ़्ल भूखा हो के भी रोता नहीं
भागता फिरता न सूरज से अगर
चाँद अपनी रौशनी खोता नहीं
फैसला तर्के तआल्लुक पर करो
मैं निभाता हूँ कभी ढोता नहीं
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