जीने का अंदाज़ बदलने वाला हूँ
जीने का अंदाज़ बदलने वाला हूँ
अपनी ही फ़ित्रत को छलने वाला हूँ
मेरे दुश्मन भी अब खुश हो जायेंगे
अपने सारे राज़ उगलने वाला हूँ
दुनिया है भूगोल बदलने में मशरूफ़
मैं सारा इतिहास बदलने वाला हूँ
अपने अपने हिस्से का सूरज रख लो
बाक़ी को मैं आज निगलने वाला हूँ
जिसने मेरी चाहत को ही छीन लिया
अपना वो भगवान बदलने वाला हूँ
दरिया! अपनी गहराई पर फ़ख़्र न कर
मैं तेरी लहरों पर चलने वाला हूँ
मेरे भीतर कोई आग दहकती है
मैं उसमें चुपचाप पिघलने वाला हूँ
धीरे धीरे सारे आँसू पी डाले
अब मैं दर्दो ग़म को खलने वाला हूँ
औरों की बैसाखी बन कर खूब चला
अपना जिस्म उठाकर चलने वाला हूँ
पिघला हूँ जिसकी चाहत की शिद्दत से
उसके ही साँचे में ढलने वाला हूँ
Comments
Post a Comment